Sunday, July 3, 2016

[ व्यंग्य ] चचा बैठे ट्रेन में +रमेशराज




       [ व्यंग्य ]
चचा बैठे ट्रेन में

+रमेशराज 
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वैसे मैं न तो बीमा ऐजेन्ट हूँ और न किसी बीमा कम्पनी वाले का रिश्तेदार | फिर भी अपनी सफेद दाड़ी और नकली दांतों के अनुभव के आधार पर इतना जरूर कहूंगा कि आप किसी महाजन से कर्ज लें, डकैती डालें, चोरी करें या अपने घर के सारे बर्तन बेच दें, लेकिन बीमा जरूर करायें | अरे भाई! बीमा हर कोई कराता है, चाहे काला चोर हो या सफेद व्यापारी, सरकारी तंत्र का अंग हो या अपंग हो, पैदल चलता हो या बैलगाड़ी में, रेल में यात्रा करता हो या हवाई जहाज में।
अब आप कहेंगे कि मैं न तो बीमा एजेन्ट हूं  और न बीमा कम्पनी का कोई रिश्तेदार, फिर बीमा कम्पनी की इस तरह पैरवी क्यों कर रहा हूं |  अरे भाई! हुआ यह कि सौभाग्यवश एक दिन हमें ट्रेन में सफर करने का मौका मिला | हम मारे खुशी के अपने चरमराते ढांचे से और हिलती हुयी गर्दन को लेकर डिब्बे में तुरन्त घुस गये | अभी एक कोने में टिक ही पाये थे कि एक मनचले युवक की आवाज हमारे कानों में पड़ी-’’ रामगढ़ गये तो यूं समझो कि रामगढ़ गये |”  हमने कुछ घबराकर उस युवक से कहा-’’ बेटे! तुम्हें ऐसी बात नहीं करनी चाहिये |’’ मेरा यह कहना था कि युवक ने तपाक से एक और डायलाग उगल दिया, “चचा! जिन्दगी एक सफर है सुहाना, यहां कल क्या हो किसने जाना |’’ यह सुनते ही हमारा जर्जर शरीर झुनझुने की तरह बज उठा | हमने थोड़ा संयत होते हुए उस युवक में पूछा-’’ बेटे तुम करते क्या हो ?’’ यह सुनकर वह युवक मुस्कराते हुए बोला- चचा! मैं लोगों का जीवन-बीमा करता-फिरता हूँ | आपने अपना बीमा कराया कि नहीं |”
“ बेटे! मैं तो  साठ से ऊपर का हो रहा हूं | अब बीमा कराकर करूंगा  क्या?
 मैं इतना कह ही पाया था कि पूरे डिब्बे में हड़कम्प मच गया | मारे भय के किसी ने अपनी आंखे बन्द कर लीं तो कोई हनुमान चालीसा का जाप करने लगा | तभी हमें मालूम पड़ा कि इसी लाइन पर तेज गति से एक और एक्सप्रेस आ रही है और एक्सी-डेन्ट की सम्भावना है | उस समय हमारी स्थिति ठीक वैसी ही हो गयी जैसे किसी मरीज को पेन्सिलिन का इंजेक्शन रिएक्शन कर गया हो | जाने कौन-सी शुभ घड़ी थी कि दुर्घटना होते होते टल गयी वरना...|
वह युवक पुनः एक फिकरा कसने लगा....’’ इब्तिदा-ए-इश्क है रोता है क्या? आगे...आगे देखिए होता है क्या?’’ उस युवक का इतना कहना था कि गाड़ी झटके के साथ रूक गयी, जबकि वहां न कोई स्टेशन था और न दूर तक कोई शहर दिखलायी दे रहा था | घने भयावह जंगल के बीच यकायक गाड़ी रुकने का सबब हमारी समझ में नहीं आया | हमने उसी युवक से  जिज्ञासा जाहिर करते हुए पूछा-“बेटे! अब क्या हुआ ?’’ उस युवक ने  उत्तर देने के बजाय मुस्कराते हुए फिर एक नया फिकरा कसा-“अब तो प्रतिपल घात है चाचा, दर्दों की सौगात है चाचा | ‘‘
उस युवक की बेतुकी लेकिन भय से सराबोर कर देने वाली बातों से  हमें लगने लगा कि यह युवक कोई साधारण युवक नहीं, कोई पहुंचा हुआ ज्योतिषि मालूम पड़ता है | हम आगे होने वाली दुर्घटना से आतंकित होकर थर-थर कांपने लगे| हमारे दिमाग पर हर बार एक ही प्रश्न हथौड़े की तरह पड़ रहा था- “प्रभु! अब क्या होगा?
तभी एक कड़कदार आवाज हमारे कानों में पड़ी- बुड्डे क्या है तेरे पास, चल जल्दी से निकाल |”
 दो नकाबपोश हमारे सामने चाकू लेकर खड़े थे | उन्हें देख हमें मानो काठ मार गया | हमने अपनी जेब से चार आने के खरीदे चने, एक अठन्नी और रामगढ़ का टिकिट उन्हें चुपचाप भेंट कर दिया | वे  खिसियाकर यह कहते हुए दूसरी सवारियों की ओर बढ़ गए- ‘‘साला बुढ्डा मजाक करता है |’’
 हमने चैन की सांस ली और अपनी बूढ़ी आंखों पर जोर डालते हुए चारों तरफ निगाह मारी | लेकिन फिकरा कसने वाले युवक का कहीं पता न था | डकैत सवारियों का माल लूटकर चले गए | तभी वह युवक शौचालय से निकला और जैसे ही गाड़ी आगे बढ़ी, उस युवक ने पुनः एक नया फिकरा कसा-’’ चोर माल ले गये, लोटा थाल ले गये, सूटकेस अटैची धोती शाल ले गये | और सब डरे-डरे ट्रेन में खड़े-खड़े चाकू की चमकती हुयी धार देखते रहे |’’
एक तरफ जहां पूरे डिब्बे में मातम जैसा माहौल बना हुआ था, वहीं  वह युवक ऐसे जुमले कस रहा था कि हमारी इच्छा होने लगी कि या तो उस युवक के मुंह पर टेप जड़ दें या अपनी दाढ़ी नोंच लें | लेकिन अपने देश की कानून व्यवस्था की तरह हम उस युवक और अपने साथ न्याय करने में कहीं न कहीं कतरा रहे थे।
अभी गाड़ी व मुश्किल से दो किलो मीटर आगे बढ़ी होगी कि झटके के साथ पुनः रूक गयी | गाड़ी के रुकने के साथ-साथ अब हमें लग रहा था कि हमारे जीवन की गाड़ी भी रुकने वाली है | लेकिन वह कमबख्त युवक था कि अब भी गुनगुना रहा था समझौता गमों में कर लो, जिदंगी में गम भी मिलते हैं |”
 सूरदासजी ने लिखा है- ‘मेरो मन अनत कहां सुख पावै, जैसे उड़ जहाज को पंछी जहाज पै आवै।‘ वैसी ही स्थिति हो रही थी हमारी | हमें उस युवक की जुमलेबाजी पर इतना गुस्सा आ रहा था कि हम उससे बात भी नहीं करना चाहते थे लेकिन हमारी मजबूरी की हमें मिमियाते स्वर में उस युवक से पूछना ही पड़ा’’ बेटे! अब की बार गाड़ी क्यों रूक गयी’’?
‘‘कुछ नहीं चचा कुछ देशभक्तों ने पटरियों के नट वोल्ट खोल दिए हैं और अब गाड़ी पर पथराव की योजना बना रहे हैं |’’ उस युवक ने यह बात जितने सहज ढंग से कही, हम उतने ही असहज हो गये | तभी एक पत्थर हमारे माथे पर लगा | हम गश खाकर बेहोश हो गये | जब होश आया तो गाड़ी रामगढ़ में प्रवेश कर रही थी और वह युवक हमारी ओर मुस्कराते हुए हमसे कह रहा था- ‘‘जान बची लाखों पाए, लो चाचा रामगढ़ आए |’’
रामगढ़ आते ही हमने अपना चश्मा ठीक किया, लाठी उठायी और आनन-फानन में ट्रेन से बाहर कूद पड़े | वह युवक जोर-जोर से चिल्लाते हुए अब भी हमसे कह रहा था- ’’ चचा आपने अपना जीवन बीमा नहीं कराया तो कोई बात नहीं... अपने बच्चों का जीवनबीमा जरूर करा लेना....|”
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+रमेशराज, 15/109 ईसानगर, अलीगढ़-202001, mob.-9634551630   

[ व्यंग्य ] दास्ताने-कुर्ता पैजामा +रमेशराज






     [ व्यंग्य ]
दास्ताने-कुर्ता पैजामा

+रमेशराज
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काफी दिनों से खादी का कुर्ता-पजामा बनवाने की प्रबल इच्छा हो रही है। इसके कुछ विशेष कारण भी है, एक तो भारतीय-बोध से जुड़ना चाहता हूं, दूसरे टेरीकाट के कपड़े पहनते-पहनते जी भी ऊब गया है।
सच कहूं, मैं आपसे सरासर झूठ बोल रहा हूं | दरअसल अब मेरी जेब में इतना पैसा ही नहीं है कि टेरीकोट के नये कपड़े सिलवा सकूं, अगर हैं भी तो उससे अपनी अपेक्षा बच्चों के लिए यह सब ज्यादा आवश्यक समझता हूं, क्या करूं? बच्चे टेरीकाट पहने बिना कालिज ही नहीं जाते। पप्पू और पिंकी दोनों जिद पर अड़े हुए है- ‘‘पापा जब तक आप हमें अच्छे कपड़े नहीं सिलवायेंगे, हम कालिज नहीं जाऐंगे | हमारे इन सूती कपड़ों को देखकर हमारा मज़ाक उड़ाया जाता है। हमें हीनदृष्टि से देखा जाता है, पापा हमें भी टेरीकाट के कपड़े सिलवा दो न।’’
क्या जवाब दूं इन बच्चों कों? कुछ भी तो समझ नहीं आता, मंहगाई दिन--दिन बढ़ती जा रही है | तनख्वाह वही हज़ार रूपल्ली | किस-किस को पहनाऊं टेरीकाट?
खैर.... जो भी हो, बच्चों के लिए टैरीकाट, अपने लिए खादी का कुर्ता पाजामा ले आया हूं, और लो भाई उसे अब पहन भी लिया।
‘‘देखो तो! केसा लगता हूं!
‘‘क्या खाक लगते हो.... जोकर दिखायी देते हो जोकर.... किसी अन्य चीज में कटौती कर लेते... क्या जरूरत थी इस तरह खुद को तमाशा बनाने की..... बच्चे सूती कपड़े पहनकर नहीं जा सकते.... दो दो तमाचे पड़ जायें तो सीधे भागेंगे कालिज...|’’
पत्नी के चेहरे के भावों को पढ़कर तो यही लगता है। ओफ्फोह... कभी-कभी पत्नी की खामोशी भी कितनी भयावह होती है...
पत्नी से आगे बिना कोई शब्द कहे मैं चुपचाप दफ्तर खिसक आया हूं। आज तो बड़ी हैरत से देख रहे हैं ये लोग मुझे।
‘‘आइए! नेताजी आइए!’’
अरे भाई जल्दी करो हमारे नेताजी को नगर पालिका और भ्रष्टाचारविषय पर भाषण देना है... बदतमीजो अभी तक मंच भी तैयार नहीं हुआ।’’
बड़े बाबू मुझ पर चुटकियां लेते हुए बोलते हैं । दफ्तर में ठहाकों की एक बौछार हो जाती है..‘‘क्या फब रहे हो यार!’’ एकाउन्टेन्ट अपनी पेन्ट ऊपर खिसकाते हुए एक और चुटकी लेता है। मैं एक खिसियानी सी हंसी हंसता हूं।
‘‘अबे ! झूठ क्यों बोलता है?... शेखचिल्ली लग रहा है शेखचिल्ली!! बीच में एक और कर निरीक्षक की आवाज उमरती है।
‘‘चुप बे! असली व्यक्तित्व तो कुर्ते पाजामे में ही झलकता है’’ बड़े बाबू पुनः चुटकी लेते हैं।
कटाक्ष-दर-कटाक्ष, व्यंग्य दर व्यंग्य, चुटकी-दर-चुटकी सह नहीं पा रहा हूं मैं | सोच रहा हूं- ‘‘क्या इस भारतीय परिधान में सचमुच इतना बे-महत्व का हो गया हूं....!!! इन बाबुओं को तो छोड़ों, ये साला चपरासी रामदीन कैसा खैं खैं दांत निपोर रहा है.. जी में आता है कि साले की बत्तीसी तोड़कर हाथ पर रख दूं... कुर्ता पजामा पहनकर क्या आ गया हूँ, सालों ने मज़ाक बना लिया।‘‘ ढेर सारे इस तरह के प्रश्न और विचार उठ रहे है। मन ही मन मैं कभी किसी को तो कभी किसी को डांट रहा हूं।
वार्ड उन्नीस की फाइल मेरे हाथों में है, पर काम करने को जी नहीं हो रहा है.. मैं अन्दर ही अन्दर जैसे महसूस कर रहा हूं कि प्रत्येक बाबू की मुझ पर टिकी दृष्टि मेरे भीतर अम्ल पैदा कर रही है और मैं एक लोहे का टुकड़ा हूं।
आज इतवार का अवकाश है। घर पर करने को कोई काम भी नहीं है। जी उचाट-सा हो रहा है। मीनाक्षी में शोले लगी है, बिरजू कह रहा था अच्छी  फिल्म है। सोच रहा हूं देख ही आऊं | लो अब मैं वही कुर्ता-पजामा पहन कर फिल्म देखने घर से निकल आया हूं और एक रिक्शे में बैठ गया हूं।
‘‘बाबूजी! आखिर इस देश का होगा क्या?’’ रिक्शेवाला पैडल मारते हुए बोलता है।
‘‘क्यों? मैं एक फिल्म का पोस्टर देखते-देखते उत्तर देता हूं।’’
‘‘जिधर देखो उधर हायतौबा मची हुई है... भूख.... गरीबी.... अपराध....भ्रष्टाचार.... हत्याओं से अखबार भरे रहते है |’’ मैं उसे कोई उत्तर नहीं देता हूं बल्कि एक दूसरे पोस्टर जिस पर हैलेन की अर्धनग्न   तस्वीर दिख रही है, उसे  गौर से देखता हूं।
‘‘आजकल बलात्कार बहुत हो रहे हैं बाबूजी वह भी थाने में....|’’
‘‘क्या यह सब पहले नहीं हुआ भाई...|’’
‘‘हुआ तो है पर.... अकालियों को ही लो... हमारी प्रधनमंत्री कहती हैं....|” रिक्शेवाला एक ही धुन में बके जा रहा है-..... बाबूजी इन नेताओं ने तो.... खादी के कपड़े पहनकर वो सब्जबाग दिखाये हैं कि पूछो मत....|’’
अच्छा तो ये हजरत मेरा कुर्ता-पजामा देखकर मुझे नेता समझ कर अपनी भडांस निकाल रहे हैं, यह बात दिमाग में आते ही मेरी इच्छा होती है कि इन कपड़ों को फाड़कर फैंक दूं और आदिम मुद्रा में यहां से भाग छूटूं।
‘‘चल चल ज्यादा बकबक मत कर’’ मैं उस पर बरस पड़ता हूं। रिक्शे वाला रास्ते भर मुझसे बगैर बातचीत किए मीनाक्षी पर उतार देता है |
‘‘ बड़ी भीड़ है.... उफ् इतनी लम्बी लाइन... क्या सारा शहर आज ही फिल्म देखने पर उतर आया है.... कैसे मिलेगी टिकट....?’’’ मैं लाइन से काफी अलग खड़े होकर सोचता हूं।
‘‘भाईसाहब टिकिट है क्या? 50 रुपये ले लो... एक फर्स्ट क्लास...|” एक युवक मेरे पास आकर बोलता है।
‘‘मैं क्या टिकिट ब्लैकर लगता हूं जो....|’’ मैं उसे डांट देता हूं।
‘‘अजी छोडि़ए इस हिन्दुस्तान में नेता क्या नहीं करते, चुपचाप टिकिट निकालिए.... पन्द्रह रुपये और ले लीजिए.... हमें तो आज हर हाल में फिल्म देखनी है।’’ वह ढ़ीटता भरे स्वर में बोलता है।
‘‘जाते हो या पुलिस को....’’ मैं उसे धमकी देता हूं।
‘‘पुलिस! हां हां क्यों नहीं.. आजकल तो वह आपके इशारों पर नाचती है ।’’ वह बीड़ी सुलगाते हुए बोलता है।
‘‘केसे बदतमीज से पाला पड़ गया |’’ मैं आवेश में चीख पड़ता हूं।
‘‘ साला! गाली देता है... बहुत देखे हैं तुझ जेसे खद्दरधारी |’’ वह भी तैश में आ जाता है।
मैं हाथापाई पर उतर आया हूं, वह भी हाथापाई पर उतार आया है... लोगों ने बीच-बिचाव कर दिया है... मेरा मूड बेहद खराब हो चला है।
मैं पिक्चर देखे बगैर घर लौट आ गया हूं... और अब बिस्तर पर पड़ा-पड़ा सोच रहा हूं-‘‘ सुबह होते ही यह कुर्ता-पाजामा किसी भिखारी को दे दूंगा.. जब तक नये टेरीकाट के कपड़े नहीं बन जाते, यूं ही फटे पेन्ट-शर्ट में दफ्रतर जाता रहूंगा...
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+रमेशराज, 15/109 ईसानगर, अलीगढ़-202001, mob.-9634551630   

[ व्यंग्य ] माया फील गुड की +रमेशराज





[ व्यंग्य ]
माया फील गुड की

+रमेशराज
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फील गुडमुहावरे का इतिहास बहुत पुराना है। आदि देव शिव ने अनेक राक्षसों को इसका अनुभव कराया। भस्मासुर ने तो शिव से वरदान प्राप्तकर इतना फील गुड किया कि शिवजी को ही फील गुड कराने लगा। वह उनके पीछे हाथ धोकर पड़ गया। आदि देव शिव भस्मासुर को तो फील गुड कराना चाहते थे, लेकिन भस्मासुर के फील गुड के सामने वह घबरा गये। अपने फील गुड को बचाने के चक्कर में उन्हें भस्मासुर के साथ-साथ उसके फील गुड का भी अन्त करना पड़ा।
मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने सुग्रीव को फील गुड, उसी के भाई बाली की हत्या कर कराया। उनके स्वयं के फील गुड पर जब एक धोबी ने शंकाओं के वाण दागे तो वे तिलमिला उठे। वे अपनी प्रिय और अभिन्न सीता को राज-निकालादेकर ही अपने फील गुड के बचा सके।
महायोगी श्रीकृष्ण भी राधा और गोपियों को बांहों में भरकर फील गुड कराते रहे, किन्तु जब मथुरा के राजा बन गये तो उन्होंने रुक्मिणी के साथ-साथ कुब्जा को भी फील गुड कराया। उस समय उन्होंने वियोग में तड़पती राधा को, फील गुड के दूसरे रूप निराकारसे उद्धव के द्वारा  परिचित कराया। पर बेचारी राधा की समझ में यह रूप नहीं आया।
गुरु द्रोणाचार्य अर्जुन को फील गुड करना चाहते थे, इसके लिये उन्होंने एकलव्य का अंगूठा मांग लिया और अर्जुन यह देखकर फील गुड-फील गुड चिल्लाने लगा।
मौहम्मद गौरी ने जब भारत पर हमला किया तो पृथ्वीराज चौहान ने फील गुड कराने के चक्कर में अनेक बार उसे छोड़ दिया। वह पृथ्वीराज चौहान के फील गुड फैक्टर से इतना अभिभूत हुआ कि चौहान की गिरफ्तार करने के बाद ही उसके फील गुड के स्थान पर फील बैस्ट किया।
राजा मानसिंह ने जोधाबाई जब अकबर की अर्धांगिनी बनायी तो अकबर के मन में फील गुड की फसल लहलहायी।
गांधीजी अंग्रेजों के फील गुड फैक्टर से इतने प्रभावित हुए कि उन्हें सारे के सारे क्रांन्तिकारी, आतंकवादी नज़र आने लगे। वे अंग्रेजों के फील गुड के चक्कर में जलियां वाले बाग के खूंखार किरदार ओडायर की खुलकर भर्त्सना करना भी भूल गये।
अंग्रेज, नेहरूजी को अपनी सत्ता सौंप गये। नेहरू जी भी भला किसी से क्या कम थे? उन्होंने गोरे सेठों के स्थान पर आये, काले सेठों से कहा-‘फील गुड |” काले सेठ गुड फील करते हुए इस देश का दोहन करने में जुट गये। नेहरू यहीं शान्त नहीं बैठे। उन्होंने फील गुड के लिए हिन्दू-चीनी भाई-भाईका नारा देकर अपनी अन्तर्राष्ट्रीय पहचान बनायी और माउंटवेटन से रिश्तेदारी निभायी।
इन्दिराजी का फील गुड फैक्टर बेहद प्रबल साबित हुआ। जब लोहियाजी के अनुयायी जयप्रकाश नारायण ने इन्दिराजी के फील गुड फैक्टर की हवा निकालनी चाही तो इन्दिराजी ने आपात-काल लगाकर पूरे देश से फील गुड करने को कहा। इन्दिराजी के फील गुड से प्रभावित होकर उनके सुपुत्र संजय गांधी ने नसबन्दी का अभियान चलाया।
युवा प्रधानमंत्री राजीव गांधी भी फील गुड के चक्कर में अपने नाना की तरह, अपनी अन्तर्राष्ट्रीय पहचान बनाकर महान हो जाना चाहते थे। अतः उन्होंने श्रीलंका में शान्ति सेना को पठाया, पर लिट्टे को उनका यह सराहनीय कदम नहीं भाया। लिट्टे में मानव बम चलाया।
नरसिंह राव जब प्रधानमंत्री बने तो फील गुड करते हुए इतने तने कि अपने चार कदम भ्रष्टाचार के काले सूरज की ओर बढ़ा दिये। सी.बी.आई. ने उन पर कई केस लगा दिये।
अमरीका ने हमारे भूतपूर्व प्रधानमंत्री माननीय अटल बिहारी वाजपेयी को इतना फील गुड कराया कि वे पाकिस्तानी आतंकवादी गतिविधियों के भारत में पुख़्ता प्रमाण मिलने के बावजूद, उससे शान्ति वार्ता करने में जुटे रहे। संसद और अक्षरधाम पर हुए हमलों का मलाल उन्हें फिलहाल नहीं रहा। उन्हें शेयर दलालों और मल्टीनेशन कम्पनियों की चिन्ता रही। उनके शासन में फील गुड करते हुए जार्ज फर्नान्डीज, जूदेव, तेलगी जैसे अनेक नायक, महानायक बनते गये और फील गुड-फील गुड चिल्लाये।
भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटलजी का फील गुड फैक्टर आज भी नौकरशाही पर इतना हावी है कि जनता का दोहन या उत्कोचन करने में न तो उसे शर्म आती है और न वह भय खाती है। नौकरशाही के लिये फील गुड के द्वारा बनाया गया भयमुक्त शासन का समाज, आज बाज का शक्ल ग्रहण करता हुआ, जनता के भविष्य पर झपट्टा मार रहा है। आम आदमी बेदम, निर्धन और बदहाल हैं पर कमाल है कि उससे सूखे खेतों में नयी आर्थिक-नीतियों के रंगीन सपने बोने और कंगाली में भी फील गुड होने को कहा जा रहा है।
बहरहाल भारतीय जनता हालीवुड-वालीवुड की अश्लील फिल्मों से फील गुड कर रही है। कर्जे में डूबते हुए कार और मोटरसाइकिल खरीद रही है। नयी आर्थिक-नीति पर गीद रही है।
भारत-उदय का यह नया दौर है, जिसमें न तो आम पर बौर है, न सरसों फूली है और न नये कुल्ले फूटे हैं, किन्तु हर राजनेता कोयल की तरह गा रहा है और बता रहा है कि आप माने या न माने फील गुड का वसंत आ रहा है।
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+रमेशराज, 15/109 ईसानगर, अलीगढ़-202001, mob.-9634551630